Monday, 24 December 2012

विडम्बना

क्यों कहते हो सब समान है
सब ईश्वर की संतान है
गर ऐसा है तो है क्यों नहीं
सबके सब धनवान  है
कोई जी रहा बिन रोटी के
कोई फांकता पकवान है
गर पूछो ये बात तो कहते
मेरा भारत महान है
कोई है  जीता भूखा नंगा
कोई ओढे रेशमी परिधान है
राज है क्या इस विडम्बना का
क्या ये राष्ट्र की शान   है ?
कर लो परहित दो गरीब को
इसका भी सम्मान   करो
अरे ! ये भी तो अपना भाई है
ना दिल में  अभिमान  करो
कर लो थोडा पुण्य  काम
इसके सर पर भी ताज़ रखो
इतनें से ही खुश हो लेगा वो
इस मानवता  की लाज रखो
क्यों कहते हो सब समान है
सब ईश्वर की  संतान  है
गर ऐसा है तो है क्यों नही
सब के सब धनवान  है ।

4 comments:

  1. बहुत सुन्दर रचना .. बिसंगातियों को दर्शाती हुई

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  2. बहुत-2धन्यवाद वर्मा जी , प्रोत्साहन के लिए।

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  3. सच कहा आपने ...... दिल को दिलासा देने ले लिए ही ये बाते ठीक लगती है अन्यथा नही .....

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  4. आज समाज मे दिखाई दे रही विसंगतियों की ओर कटाक्ष है ।आपका जो मत हो कृपया मार्गदर्शन करें ।

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